Friday, 8 April 2016

तेरा आफताब

तेरी मोहब्बत में चाहे बदनाम सा हो जाऊँ मैं,
जो तु चाँद है अगर आफताब सा हो जाऊँ मैं।

कभी इन्हें तुम ऊलझा के पुकारना तो सही,
जुल्फें तुम्हारी कभी तो खुद सुलझाऊँ मैं।

अजीब से शहर में बसेरा है तेरा ओ चिड़िया,
जब भी सोचुँ तुझे यहाँ गलियों में खो जाऊँ मैं।

एक तेरे नाम से पहचानते है लोग मुझे अब,
तुझे भूलकर क्यों गुमनाम सा हो जाऊँ मैं।

कभी बैठकर नजदीक मेरे तुम देखो तो सही,
स्वर तेरा ही हरदम प्यार से अब गुनगुनाऊँ मैं।

©® जाँगीड़ करन KK
08/04/2016__10:50 AM

No comments:

Post a Comment

A letter to swar by music 52

Dear swar, कई रोज़ हुए मुझे तुम्हारा कोई ख़त नहीं मिला। पहले तो मैं हर सुबह दरवाज़े की आहट पर चौंक जाता था, जैसे डाकिए के हाथों में तुम्हारे...