हे ईश

रूई की फोहों से चोटिल
सर को
इक पत्थर ने सहलाया तो.....

गुलाबी फूल से घायल
पैर को
काँटों ने सँभाला तो.......

मुस्काते चेहरे में पीड़ित
आँखों को
इक दर्द ने हँसाया तो.....

इक मौन से बैकल
मन को
इक गुँगे ने पुकारा तो.......

कैसे भूलुँ ईश तेरी
कृपा को
हार से तुमने जीताया तो.......
©® जाँगीड़ करन KK

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