Friday, 18 November 2016

जीत से हार की ओर

जीत की दहलीज से मैं लौट आया हार को,
शुकुन  तो मिला  होगा अब सारे संसार को।

मन में अपने ही कितना द्वेष लिये चलते है,
क्यों युहीं दोष देते है भाई घर की दीवार को।

सुई लेकर सील लो उधड़े रिश्तों को अब तुम,
यह काम की नहीं दूर फेंको इस तलवार को।

तुम न जानें क्यों कुछ सुनातें नहीं आजकल,
कान मेरे तरस रहे 'स्वर' सुनने तेरी झंकार को।

समंदर में तो तुफानों से सामना होना है 'करन',
मैं  मजबूत कर चुका हुँ नाव  की पतवार को।
©®जाँगीड़ करन kk
18-11-2016__06:45AM

No comments:

Post a Comment

A letter to swar by music 52

Dear swar, कई रोज़ हुए मुझे तुम्हारा कोई ख़त नहीं मिला। पहले तो मैं हर सुबह दरवाज़े की आहट पर चौंक जाता था, जैसे डाकिए के हाथों में तुम्हारे...