सोमवार, 2 जनवरी 2017

A letter to swar by music 16

Dear SWAR,

"बस तारीखे और साल बदलते है
ज़िन्दगी की कशमकस मगर वही है | "
................
तुमने कल के अपने पत्र में कहा था कि आज में कविता ज़रूर लिखू मगर सुनो | मगर सुनो!! आज में कविता नहीं तुम्हारे पत्र का जवाब लिख रहा हु| और जवाब में पिछले दो दिन का अहसास लिख रहा हु | क्युकि इन दो दिनो को मैंने कुछ अलग अंदाज़ में जीने की कोशिश की है| हर तरह की विलासिता से दूर सिर्फ प्रकृति का स्नेह वो पल जो लोग सादियो पहले जीते थे| तुम्हे अंदाज़ा नहीं होगा कि में कितना सफल रहा हु| में जानता हु कई लोगों को इससे आपति हुई है मगर में ऐसा ही हु| कभी कभी यह ज़रूरी भी लगता है| खेर अब चिंता न करो में आ गया हु न तुम्हारे पत्र का जवाब लेकर| और इस पत्र में वही उन दिनों को बयां कर करूँगा|
में एक गाँव के दृश्यों की काल्पना में सिर्फ तुमको देख पता हु| में दृश्यों में तुम्हारी मोजुदगी दिखूंगा तूम अपने शहर में खुद को उन दृश्यों में महसूस करना, आनंद आएगा तुम्हे भी| तुम समझ रही हो न क्या कहना चाह रहा हु| हा || बस में जो लिख रहा हु उस हर पंक्ति में खुद को महसूस करना| जैसे कि ये सारी घटनाये तुम्हारे शहर में हुई हो|
हा तो सुनो पार्टनर!!!!!
सबसे पहले उस गाँव में मेने देखी बहुत सी हरी हरी झाडिया जो शायद कंटीली भी थी और मुझे झाड़ियों के बीच तुम भी दिखाई दी!! तुम ही थी न वो!!! हा!! मेरी जाना वो तुम ही थी में देख पा रहा था तुमको उन झाड़ियों के बीच अपनी सह्लियों संग अटखेलियाँ करते हुए| मेरी नजरें बार बार उन झाड़ियों की और जा रही थी इसका मतलब तुम वह था कि तुम ही थी वो| और तुम तो यह सोचो कि सर्दी के मौसम में भी बार पसीना पोछ रही थी जैसे कि यह गरमी का मौसम हो| तुम बार आकाश की तरफ देख रही थी शायद सूरज बाबा से कुछ शिकायत करने के मूड में थी| में तुम्हारी आवाज़ सुन रहा था तुम अपनी सहेलियों से कह रही थी की देखो कितनी गर्मी है| हा मेरी जाना !! में तुम्हें मह्सूस कर रहा था वहा तुम अपने दुपट्टे से बार हवा कर रही थी एक बारगी तो मन किया की में दोड़कर तुम्हारे पास आ जाऊ और तुम्हारे घुटनों को तकिया बनाकर सो जाऊ और तुम यु मेरे हवा करती रहो| हा !! तुम समझ रही हो न क्या कह रहा हु में|
पर में पहले तो सोच में पड गया कि तुम यहाँ क्या कर रही हो , लेकिन उसी समय पहाड़ी से उतरती हुई बकरियां नजर आई और में तुरंत समझ गया| अब आगे बताने कि ज़रूरत नहीं है क्यूंकि में कई बार पहले बता चूका हु यह तो |
हां तो !!! लापरवाह ग्वालिन!!
तुम अपनी बकरियों को सुना छोड़ कर यहाँ मजे कर रही हो|| है ना!! और उस समय तुम्हारी बकरिया उस ताल के पास आई थी पानी पीने||  उस समय ताल का दृश्य बहुत ही शानदार हो गया| तुम ज़रा पास आती ताल के तो क्या कहना था\| मगर तुम ठहरी अकडू तुमने आना तो छोडो आने की सोची भी नहीं| हा!! शायद तुम्हे मुझसे कुछ लाज सी आई होगी| इसलिए भी तुम नहीं आई| में समझ सकता हु||
ख़ैर सुनो!! वो दृश्य बड़ा ही मनोरम था में तुम्हारे ख्याल में खोया बकरियों के पीछे पीछे ताल के पानी के बिलकुल करीब चला गया और बकरियों के फोटो भी खीच लिए| और खुद के भी| तुम नहीं जानती की उस दृश्य को देख कर बहुत ख़ुशी हुई लगाकि प्रकृति ने सारा प्यार इस ताल पर लुटा दिया हो| में बस मंत्रमुग्ध होकर देखता ही रहा| न जाने कब बकरिया पानी पीकर चली गई पता ही नहीं चला|
और सुनो||
वह ताल में जहा पानी सूख गया था वहा पर जो हरी हरी काई थी वो अब सफ़ेद रेत के समान  हो गई है उस पर चलने का मजा ही कुछ और लगा| मैंने नीचे बैठकर उनको सहलाया तो ऐसे लगा जैसे की वो तुम्हारी जुल्फें हो| उसके रेशे एक दुसरे में ऐसे उलझे थे जैसे की तुम्हारी जुल्फें एक दुसरे में उलझी हो|| मैंने अपने हाथ से उन्हें सुलझाने की कोशिश की मगर सफल नहीं हुआ जानती हो क्यों ?
क्यूंकि तुमने कभी मुझे अपनी जुल्फें सुलझाने का भी मौका नहीं दिया ना|| बस उस सूखी काई पर बैठकर एक कल्पना की ऐसा लगा जैसे कि हम दोनों साथ बैठे है वहा पर|| एक दुसरे की अपनी उलझने बतिया रहे थे| वो उलझने जिससे हम दोनों आपस में एक दुसरे से उलझे बैठे है| तुम खुद को सुलझाने में व्यस्त हो यह भी ध्यान नहीं लगा रही कि इस सुलझाने के क्रम मेरे कितने रेशे टूटे है, मगर में!!! में तो उलझा रहना चाहता हु आज भी , कल भी, सालों बाद तक भी और जन्म जन्मान्तर तक भी|| और मेरी अभिलाषा यही उलझन है| में इस उलझन में खोना चाहता हु जैसे की इस काई के नीचे की गीली मिट्टी है , वो अब तक इसलिए इसलिए गीली है क्यूकि उस पर काई की उलझन साया बनकर छाई है!! तुम समझ रही हो न में क्या कह रहा हु || सुनो|| तुम मेरे प्यार की धरती पर यु काई सा बनकर छाई रहोगी न??
मुझे मालूम है जीवन में यह कदम बहुत मुश्किल है मगर असंभव तो नहीं है न!! ज़रा दिल से सोचना!! कभी फुरसत में फिर मुझे सोचकर देखना|| अपने शहर की आबोहवा में इस गाँव के दृश्य की कल्पना करके सोचना और साथ में इस दृश्य में हम दोनों को साथ देखना| तब सोच पाओगी ||
हा पार्टनर !!! तब तुम देख पाओगी मेरा वो संसार, वो संसार जो इस ताल की नैसर्गिक सुन्दरता जैसा है, जहाँ सबकुछ ज़िन्दगी के मुताबिक है , बस एक तुम्हारी कमी है.................................
और सुनो|| इन दो दिनों के उस गाँव के भ्रमण में और बहुत कुछ देखकर तुम्हे सोचा है, अगले पत्र में और लिखुंगा...

फिलहाल तो इतना ही......
with love yours
music
©® जाँगीड़ करन kk
01/01/2017____10:00PM

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