Wednesday, 24 February 2016

बोझिल राहें

बोझिल सी राहें
गुमसुम सी निगाहें,
संभलकर भी
संभल नहीं पा रहा हुँ मैं।

दिल है बेकरार,
सुनता नहीं प्यार,
समझकर भी
समझ नहीं पा रहा हुँ मैं।

कहाँ है ऊलझन,
जिंदगी बनी जोगन,
जी कर भी
जी नहीं पा रहा हुँ मैं।

समझता नहीं कोई,
फिर भी आँख रोई,
भूलकर भी उन्हें
भूल नहीं पा रहा हुँ मैं।

आवाज है सुन्न,
तन्हा है मन,
सुनकर भी 'स्वर'
सुन नहीं पा रहा हुँ मैं।

बदलता है जहाँ,
ठहरता है कहाँ,
'करन' तो हुँ मगर
कर्ण नहीं हो पा रहा हुँ मैं।

©® जाँगीड़ करन kk
24/02/2016....... 18:30 pm

Wednesday, 10 February 2016

दलदल सी जमीं

बहुत भोला ही रहा है तु क्या मालुम नहीं तुझे।
पीठ पे होता है वार यहाँ क्या मालुम नहीं तुझे।।

कैसे तेरी लंबी उम्र की दुआ की है अभी अभी,
वो तेरे कत्ल में शामिल है क्या मालुम नहीं तुझे।

कोई लेना देना नहीं है किसी से आदमी को यहाँ,
सब रिश्ते स्वार्थ के लिये है क्या मालुम नहीं तुझे।

बैकार के हाथ पैर मारना भी तु बंद कर दे अब,
यह दलदल सी जमीं है क्या मालुम नहीं तुझे।

तुने उनसे आँख मिलाने की भी हिम्मत कैसे की,
वो बड़े औहदे वाले लोग है क्या मालुम नहीं तुझे।

बस तु अपना 'स्वर' खुद ही गुनगुनाया कर 'करन',
सुनता नहीं कोई दिल से इसे क्या मालुम नहीं तुझे।

©® जाँगीड़ करन kk
10/02/2015_7:10 morning

फोटो- साभार गुगल

Friday, 5 February 2016

A letter to swar by music 5

हैलो स्वर,

आज अभी अभी मुझे युँ लगा कि तुमने मुझे याद किया है। लेकिन अगर तुमसे मैं पुछुँगा तो भी तुम साफ साफ इंकार कर दोगी।
और यहीं कहोगी कि यह सब मेरा भ्रम था। लेकिन सच तो यह है कि तुम्हें फुर्सत मिली है हमें याद करने की। तुम्हारे मानने न मानने से यह झुठा साबित नहीं हो सकता।

और देखो जो तुमने मेरे सामने सवाल रखा था मैं उसी सवाल में उलझा हुँ। मैनें अपनी तरफ से जो उत्तर दिया था उस पर आज भी कायम हुँ लेकिन यार थोड़ा बहुत तो तुम्हें भी समझना चाहिये ना!!!
पर तु ठहरी नालायक!! तुम्हें जरा सी परवाह नहीं मेरी। कितनी लापरवाह हो तुम।
।।।।।।।
जानती हो आज जब मैं बाहर किसी गाँव से वापस घर लौटकर आया तब बिल्कुल थक गया था।
पता है उस समय तेरी बहुत याद आई। बस दिल में एक ही ख्याल आया कि काश तु यहाँ होती तो कितना अच्छा होता!! तेरी मुस्कुराहट से ही मेरी सारी थकावट छुमंतर हो जाती। और!! तुम्हें मालुम तो है ना तुम और नीतु ही वो शख्स है जिनके एक इशारे पर मेरी थकावट मुझसे कोसों दूर हो जाते हैं, जब तुम दोनों पास हो तो दुनियाँ कितनी हसीन लगती है, लेकिन मेरी किस्मत में न जानें कैसे दिन लिखें है?
तुम दोनों ही पास नहीं हो!
क्यों दूर दूर से हो तुम????
।।।।।।
तुम्हें मालुम हो कि मैं यहाँ हर पल ही तेरे ही ख्यालों में खोया रहता हुँ, कुछ भी पता नहीं रहता है,
तुम शायद मेरे ख्यालों में नहीं खोती होगी, क्योंकि तुम्हें तो काम भी बहुत सारे करने पड़ते है ना!! सुबह उठकर पढ़ना, फिर नहा धोकर तैयार होना।।।
हाँ!! क्या अब भी तुम बालों को बनाने में उतना ही वक्त लगाती हो?
वो हेयर पिन को एक बार मुँह में पकड़कर फिर ही बालों में लगाती हो ना!!
या भूल गई वैसा सबकुछ!!!
हाँ मुझे सब याद है अब भी!!!
स्कूल लेट हो जाना!!
मालुम है ना????
मैं भी कितना पागल हुँ ना क्या क्या लेकर बैठ गया। पर क्या करूँ यार!!याद आ जाते हैं वो दिन।।
बस मैं बैठकर याद करता हुँ उन दिनों को, कितने आँसु बहा दिये पर यें यादें धुँधली ही नहीं होती,
लगता है कि जैसे कल की ही बात हो!!
।।।।
और देखो सर्दी भी कम पड़ गई है! परीक्षा नजदीक आ गई है, तुम्हें भी इसकी चिंता तो रहती है ना!!
हाँ मैं भी परीक्षा देने वाला हुँ पर कोई डर नहीं, अब कुछ पाने की इच्छा नहीं होती!
तुम्हारी यादें और तुम्हारा इंतजार मिला है ना यहीं काफी है सदियों तक साँसों को चलाने के लिये!!
फिर भी हर बार की तरह यह तो कहुँगा कि अब भी आ सको तो आ जाना!!
बाकी इंतजार तो है और रहना ही है.....
सदा के लिये इंतजार तुम्हारी यादों के साथ........
..............
तुम याद करो या न करो तुम्हारे बस में है,
पर मैं याद न करूँ यह भी मेरे बस में नहीं है।
।।।।।।।।
अब सो रहा हुँ
शुभरात्रि ।।।।।।
05/02/2016_____23:45 pm
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सिर्फ तुम्हारा
संगीत

©® जाँगीड़ करन kk

फोटो साभार गुगल

Thursday, 28 January 2016

माँ कहाँ हो तुम

जो पल चला गया है वो कभी लौटकर नहीं आया,
गौरैया भी उदास है आज उसने गीत नहीं गाया।

बहला के देख चुका हुँ दिल को हजार बहानों से,
बचपन का सा मजा फिर भी कहीं नहीं आया।

कैसी भागदौड़ में गुम सुम हुआ सा जाता हुँ मैं,
दर्पण भी बोला मुझसे कई दिनों से नहीं मुस्कुराया।

आज कार का सफर भी उदासी भरा लगता है,
पिता के कंधे पे मेले में जाने सा मजा नहीं आया।

कैसी बैचेनियाँ दिल में घर कर चुकी है न जानें,
कई दिनों से 'स्वर' खुशी का कोई नहीं गुनगुनाया।

हर एक दर पर सजदा कर के देख चुका है 'करन',
माँ के चरणों सा सुकुन फिर भी कोई दे नहीं पाया।

©® जाँगीड़ करन kk
28/01/2016_22:30 pm

चित्र- साभार गुगल

Friday, 15 January 2016

शर्मो हयाँ

बागों में तो फूल युहीं खिलते है।
भँवरों के दिल भला क्यों मचलते है।।

युँ तो बहुत शर्माते है वो महफिल में,
अकेले में पर हमसे बेपर्दा मिलते है।

नफरतों की हवा है शहर में तुम्हारे,
लफ़्जों में हम मोहब्बत लिये फिरते है।

सिलती है कमीज का टूटा बटन जब,
तराने मोहब्बत के दिल में उठते है।

कहाँ तक भाग पायेगी तु हमसे दूर,
हम बाँहें आसमाँ तक पसारे रखते है।

जो ख्वाबों में तो रोज ही आते है 'करन',
वहीं 'स्वर' क्यों खफा खफा से रहते है।।

@करन जाँगीड़ kk
15/01/2016_20:30 pm

#चित्र_साभार_गुगल

Monday, 11 January 2016

दिव्यांग

काल की गति से कदम आगे रखता हुँ।
बेबस न समझो हौंसले मैं भी रखता हुँ।।

माना तुम हुनरमंद हो अपनी जालसाजी के,
दिल में निर्मलता की ताकत मैं भी रखता हुँ।

बेशुमार दौलत रख लो तुम अपने हिस्से में,
माँ के पैरों की सुगंध घर में मैं भी रखता हुँ।

दुनियाँ की तड़क भड़क से मुझे क्या मतलब,
एक मासुम सा बैचेन 'स्वर' मैं भी रखता हुँ।

तुम मुझे कह लो जो मर्जी हो तुम्हारी 'करन',
दिव्यांग हुँ पर जुनुन जीत का मैं भी रखता हुँ।

©® करन जाँगीड़ kk
11/01/2016_14:25 pm

Sunday, 10 January 2016

पत्थरों का शहर

आँखें तो नम है मुस्कुराता रहा हुँ फिर भी।
बोझिल सी है राहें चलता रहा हुँ फिर भी।।

जानता था मैं कि यह फरेब ही है,
दिल दे बैठा इक मुस्कान पे फिर भी।

बिखर गया है दिल आइने की तरह,
तस्वीर को पुरी दिखाता है फिर भी।

नींद नहीं है मेरी आखों में यहाँ,
संजोने ख्वाबों को सोना है फिर भी।

पत्थरों का शहर है यह तो 'करन',
घायल नहीं हुआ मुसाफिर फिर भी।


©® करन जाँगीड़ kk
10/01/2016_20:00 pm

फोटो- साभार गुगल

A letter to swar by music 53

डियर स्वर, दिन ढल चुका है। शहर की शोरगुल भरी सड़कें अब धीरे-धीरे शांत होने लगी हैं। दिनभर लोगों की आवाजाही, गाड़ियों के हॉर्न और भागती-दौड़त...