गुमनाम तारा

रात गहरी है
चांद चमक रहा
मगर वो तारा
जानें कहां गया
देखो रात भी
उदास है
उस बिन
और शायर की
आँख तो
कब से
ढूँढ रही उसको,
हां, देर रात
वो
नजर आया फिर
बोला
मन उदास है
इसलिए
खुद को
छुपा लिया
अंधेरे में
कोई देख न ले,
इसलिए।
और तुम शायर भी
तो
यह करते हो,
खुद को डायरी से
बांधकर,
हां,
तुम बाहर कितना
मुस्काते हो,
सारी दुनिया को
झुठलाते हो,
मगर मैंने रात में
तुमको
तन्हा देखा है,
टेबल पर टिकी कोहनी
को
आँखें छुपाते देखा है,
बिस्तर की सलवटों में
इक वजूद को
खोते देखा है,
काली अंधेरी रात में
शायर को
जीते मरते देखा है।

©® जाँगीड़ करन kk
06/04/2017___02:30AM

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दस्तक

बचपन का सावन

जीत से हार की ओर